Religion World Oct/11/2018 (38) (3483)

भीतरी प्रचुरता का आनंद रिक्तता मिटाता है

कोई भी बाहरी चीज़ आंतरिक खालीपन को नहीं भर सकती है। आंतरिक प्रचुरता का आनंद होने पर व्यक्ति को कहीं कुछ खोजने की जरूरत नहीं पड़ती।

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डीआईवा||नई दिल्ली व्यक्ति में अभाव या कमी उसके भीतर डर उत्पन्न करती है। अक्सर व्यक्ति इस बात से डरते है कि जो उसके पास है वो उसके लिए नाकाफी है। जिससे कि वह सदैव कुछ न कुछ पाने की कोशिशें करता है। ताकि भविष्य में उनके पास सब कुछ पर्याप्त हो। कमी या अभाव के कारण व्यक्ति अपने भीतर की आंतरिक रिक्तता को बाहरी दुनिया की चीजों से भरने का प्रयास करता हैं। कोई भी बाहरी चीज़, आकर्षण, प्यार या दूसरों की तवव्जो आंतरिक खालीपन को नहीं भर सकती है। जब तक व्यक्ति स्वयं के भीतर की आंतरिक प्रचुरता का आनंद नहीं लेता। आंतरिक प्रचुरता का आनंद लेने पर व्यक्ति को कहीं कुछ खोजने की जरूरत नहीं पड़ती। प्रचुरता का अर्थ, सोची गई सभी चीजों के संभव होने या जरूरत से भी ज्यादा होने से है। व्यक्ति को अपने जीवन को सदैव प्रचुरता व समृद्धि से सजा एक उपहार की तरह देखना चाहिए। व्यक्ति और समृद्धि के सिद्धांत के बीच एक बाधा है और वो है, व्यक्ति का किसी भी स्थिति को प्रचुरता रहित देखने का नजरिया। ईश्वर ने हर किसी को असीमित संभावनाओं के साथ जीवन का सच्चा आनंद लेने के लिए ही धरती पर भेजा है। व्यक्ति में सब कुछ प्रचुर मात्रा में मौजूद है। बस जरूरत है तो केवल आंखें खोलकर देखने व क्षमताओं को आंकने की। व्यक्ति जीवन को दो तरफ से देखता है। पहला, जीवन में मेरे पास सब कुछ है। दूसरा, मेरे पास कुछ भी नहीं हैं। कुछ भी नहीं का नजरिया व्यक्ति को नेगेटिव बनाता है। व्यक्ति को अपने भीतर झांकना व हर पल का आनंद लेने की कोशिश करनी चाहिए। व्यक्ति को सदैव उन घटनाओं को याद करते रहना चाहिए, जिसमें उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिससे उसे कार्य के परिणाम से आनंद का अनुभव हुआ हो। व्यक्ति को उस कार्य को करने में उपयोग किए गए गुणों को याद रखना चाहिए। उन गुणों का उपयोग अपने दैनिक जीवन में बढ़ा देना चाहिए। ऐसा करने पर व्यक्ति के आनंद की अनुभूति बढ़ने के साथ ही उसके भीतर की रिक्तता भी भरने लगेगा। व्यक्ति को आंख बंद कर स्वयं के हर अंग को आदेश देना चाहिए। आखिरी आदेश अपने मस्तिष्क को दें कि वह विचारशून्य हो जाये। प्रारंभ में यह होता नहीं दिखेगा। लेकिन अभ्यास करते -करते मस्तिष्क विचारशून्य होने लगेगा। यह विचार शून्यता व्यक्ति के मन को हल्का कर उसे आनंद की अनुभूति करायेंगे। व्यक्ति को दुख विचार ही देते हैं, इसलिए इन विचारों से मुक्त होना आनंदमयी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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